Tunga Jaipur तुंगा राजस्थान

जयपुर से 45 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में जयपुर-लालसोट मार्ग पर स्थित तुंगा रियासत काल में बांकावत कछवाहों के अधीन था । तुंगा से बिसाऊ के ठाकुर सूरजमल शेखावत का ई.1787 का एक शिलालेख प्राप्त हुआ । शिलालेख कछवाहों तथा मराठों के बीच हुए युध से सम्बंधित है जिसमें सूरजमल शेखावत ने वीरगति प्राप्त की । सूरजमल कछवाहों की शेखावत शाखा से बिसाउ का ठाकुर था । वह अत्यंत वीर, पराक्रमी तथा कछवाहों के रिसाले का संचालक था । उसने अड़ीचा नामक गांव में ‘सूरजगढ़’ नामक विशाल दुर्ग का निर्माण करवाया । तुंगा में सूरजमल का एक भव्य स्मारक आठ खम्भों की छतरी के रूप में स्थित है । शिल्प और चित्रांकन की दृष्टि से यह छतरी देखते ही बनती है । इस स्मारक की दीवार पर उत्कीर्ण शिलालेख में सूरजमल के वीरगति पाने, दाह संस्कार होने, जयपुर राज्य की ओर से 25 विघा भूमि दान दिए जाने तथा विक्रम संवत 1886 में छतरी के निर्माण एवं उसमे शिवलिंग प्रतिष्ठित करने का उल्लेख है । सूरजमल के प्रीती पात्र सेवक चतुर्भुज दरोगा के भी युध में मारे जाने तथा उसकी स्मृति में छतरी के पास साल (कमरा) बनवाए जाने का उल्ल्लेख है ।

                           स्मारक से थोड़ी दूर पर एक विशाल जल कुण्ड है जो अपने शिल्प-वैभव के कारण दर्शनीय है । यह आम्बेर के पन्ना मियां के कुण्ड से सदृश्य रखता है । पांच मंजिल वाले इस कुण्ड के भीतर जाने के लिए कलात्मक सीढियाँ बानी हैं तथा सामने की तरफ विशाल बरामदा है, कुण्ड के पार्श्व में हनुमान जी  छोटा सा मन्दिर है । कुण्ड परिसर में प्रवेश करते ही पत्थर की एक सफेद शीला स्थापित है । जिस पर वि.सं. 1786 का एक शिलालेख उत्कीर्ण है । शिलालेख के अनुसार जो व्यक्ति इस कुण्ड के पानी को गन्दा करेगा या अन्य किसी रूप में कुण्ड की मर्यादा भंग करेगा, वह महापाप का भागी होगा । कुण्ड के पार्श्व में दादु पंथ का भी स्नान है । तुंगा में चतुर्भुज जी कल्याण जी, नृसिंहजी, बिहारीजी, सीतारामजी, चौमुखा महादेव, कोट के बालाजी, रामदेवजी तथा पद्नाभ जैन मन्दिर दर्शनीय हैं ।

तुंगा की लड़ाई :-

               तुंगा की लड़ाई 28 जुलाई 1787 को जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह तथा मराठा सेनापति महादजी सिंधिया के बीच शुरू हुई और तीन दिन तक चली । इस युध में जयपुर राज्य की ओर से कछवाहों की राजावत, धिरावत, खंगारोत, बलभद्रोत, शेखावत तथा नाथावत शाखाओं ने तथा जोधपुर नरेश के राठौड़ सैनिकों ने भाग लिया जबकि मराठों की सेना का नेतृत्व अपने समय के सबसे बड़े सेनानायक महादजी सिंधिया तथा फ्रांसीसी सेनानायक जनरल डिबोयन ने किया । मराठों और फ्रांसीसियों की सेना अपेक्षाकृत अधिक प्रशिक्षित, अधिक आधुनिक और क्रूर थी तो भी देश की रक्षा के लिए प्राण समर्पित कर देने वाले ठेठ देशी पद्दति के जयपुर व जोधपुर राज्य के सैनिकों से परास्त हो गई । जयपुर राज्य के इतिहास में तुंगा की लड़ाई एक महत्वपूर्ण सफलता मानी जाती है ।

 

 

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